ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन, ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन, नयी रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो ….वह इंसान जो जानता था कि इस उम्र में प्यार करना उसके लिए मान्य नहीं है। बावजूद इसके उसने समाज के सभी बंधनों को तोड दिया और हमेशा हमेशा के लिए एक दूसरे का हो गया। जी हां हम बात कर रहे हैं लव गुरू मटुकनाथ की वही जिसने अपनी छात्रा जूली से विवाह रचाया था।

लवगुरु मटुकनाथ अपनी जूली को लाने सात समुंदर पार पहुंच गए हैं। जल्द ही वे जूली को लेकर पटना लौटेंगे। प्रो. मटुकनाथ ने बताया कि पिछले दिनों जूली के एक संदेश ने उन्हें त्रिनिदाद एंड टोबैगो के सेंटगस्टीन तक पहुंचा दिया। सात मार्च को वहां पहुंचकर उन्होंने बताया कि वे जल्द ही जूली को लेकर पटना लौटेंगे। जूली तरह स्वस्थ हो जाएंगी। कहा कि गृहस्थ से होकर ही संन्यासतक का रास्ता जाता है। इसके विपरीत जूली बिना गृहस्थ आश्रम जिये संन्यास की ओर चल पड़ीं। उनकेस्वास्थ्य खराब होने की यह सबसे बड़ी वजह रहीं। जूली फिर से पा हु का संदेश भेजा था। स्वास्थ्य खराब चल रहा था।

मीडिया. मटुकनाथ ने कहा कि उनके प्रति शत्र॒ को वापस लाने पर उनका जवाब उन्हें. फिर रही हैं। खाना-पीना सामान्य होआश्रम में जीवन जीना चाहती हैं और प्रो. मटुक नाथ ने बताया कि दरअसल में जूली को उनके हाल पर छोड़ने की. भाव रखने वाले लोगों ने ऐसा प्रचारित मिल जाएगा। वे अपने शुभचिंतकों को चुका है और जल्द ही पटना में रहकरइस वजह से उन्होंने पटना वापस लाने जूली का मानसिक और शारीरिक खबरों का खंडन करते हुए प्रो. करने की कोशिश की लेकिन जूली. बताना चाहते हैं कि जूली अबचल- स्वास्थ्य लाभ करेंगी।

यादों के पन्‍ने पलटते हुए प्रो. मटुकनाथ ने कहा कि जूली को उन्होंने छोड़ा नहीं था बल्कि वे उनकी निजी स्वतंत्रता के समर्थक थे। लवगुरु ने बतावा कि जूली के भीतर वैराग्य का भाव 204 से ही दिखने लगा था। वे भजनों पर नृत्य करती थीं और चिंतन-मनन में लीन रहती थीं। वर्ष 206 तक वे आध्यात्मिक वातावरण में डूबने के लिए पटना से कभी-कभार वृंदावन, होशियारपुर व बाकी धर्मस्थलों पर जाया करती थीं।

वैराग्य की ओर जूली का झुकाव उन्होंने वर्ष 206 के आरंभ में देखा। उन्होंने जूली को सलाह दी कि वो चाहें तो निश्चित भाव से वैराग्य जी सकती हैं। बकौल प्रो. मटुकनाथ, जूली के मानसिक स्वास्थ्य पर वर्ष 206 के बाद ही असर होना शुरू हुआ।

जूली पटना से मटुकनाथ का घर छोड़कर ईश्वर में ध्यान लगाने वृंदावन समेत दर्जनों जगहों पर भ्रमण करती रहीं। प्रो. मटुकनाथ ने बताया कि इस बीच वे फोन के जरिए संपर्क में भी रहीं लेकिन अचानक जूली का फोन आना बंद हो गया। बाद में उन्हें जानकारी मिली कि वे अस्वस्थ हालत में त्रिनिदाद एंड टोबैगो पहुंच गई हैं। वे किसी को जीवित बुद्ध मानने लगी थीं और उनका अनुसरण करते हुए यहांइस हालत तक पहुंच गई।

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