इंसान चाह ले तो क्या नहीं कर सकता है. उच्च डिग्री लेकर अगर वह शहर की ओर जाए तो इंजीनियर, डॉक्टर या आईएएस अधिकारी बनकर नाम कमा सकता है, तो दूसरी ओर अगर पढ़ लिखकर गांव वापस लौट कर काम करें तो ग्रामीण क्षेत्रों और वहां के लोगों की किस्मत बदल सकता है. आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं जिसमें आप देखेंगे कि दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़कर एक छात्र ने अपने दम पर अपनी और अपने गांव की किस्मत बदल डाली है.

Madhepura सदर प्रखंड के बखरी गांव निवासी और जेएनयू के पूर्ववर्ती छात्र ज्योति मंडल मछली पालन कर इलाके के किसानों के लिए प्रेरणस्रोत बने हुए हैं। बड़े आयोजन में मधेपुरा ही नहीं, सहरसा और सुपौल के लोग भी जब मछली मंगाना चाहते हैं तो पहले ज्योति को याद करते हैं। ज्योति 16 एकड़ जमीन में मछली का उत्पादन करते हैं। दूसरे राज्यों से महंगे दर पर चारा मंगाते रहने से छुटकारा पाने के लिए वे अब खुद ही फिश फीड बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसी माह यदि मुख्यमंत्री सात मार्च को मेडिकल कॉलेज में ओपीडी सेवा शुरू करने आएंगे तो ज्योति के पोखर और फिश फीड प्लांट को भी देख सकते हैं।

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मछली उत्पादन के क्षेत्र में महारत उन्होंने लंबे अनुभव और अनुसंधान से हासिल किया है। हंसमुख, मिलनसार और अपनी बात को साक्ष्यों के साथ रखने वाले ज्योति की शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विवि में हुई। गांव लौटने पर खेती के पारंपरिक तरीके को देखा लेकिन लाभ की गुंजाइश कम देख वैज्ञानिक खेती शुरू की। लागत की अपेक्षा लाभ का अनुपात कम देखकर मत्स्यपालन की ओर ध्यान दिया। पहले कई राज्यों में जाकर मत्स्य पालन को गौर से देखा और तकनीकी ज्ञान हासिल किया। फिर पोखर खुदवाया।

रोजी की तलाश में 13 साल पहले पंजाब पलायन करने वाले सौरबाजार की कांप पश्चिमी पंचायत के निवासी 32 वर्षीय महादलित बीरेन्द्र सादा मधुमक्खी पालन का हुनर सीख न केवल जीवन संवार रहे बल्कि सालाना 5 लाख से अधिक कमाई कर युवाओं के बीच प्रेरणास्रोत बन गए हैं। आज इनके शहद की आपूर्ति कोलकाता तक फैल चुकी है। ग्रामीण युवाअाें काे वे स्वरोजगार का भी संदेश दे रहे हैं। बीरेन्द्र बताते हैं कि एक बॉक्स से मौसम के हिसाब से 2 से 10 किलो तक शहद का उत्पादन होता है। उनके पास 400 बॉक्स हैं।

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