PATNA : बिहार के बनगांव में मनाई जाने वाली ‘घुमौर होली’ की अपनी अलग पहचान है। इसमें लोग एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर, उठा-पटक करके होली मनाते हैं। घुमौर होली का त्‍योहार होली से एक दिन पहले मनाया जाता है। रविवार को यह धूमधाम से मनाई गई। यह ब्रज की ‘लट्ठमार होली’ की ही तरह ही प्रसिद्ध है।

भगवान श्रीकृष्‍ण के काल से ही चली आ रही परंपरा : बिहार के कोसी प्रमंडलीय मुख्‍यालय से सटे एक प्रखंड है कहरा। इसके एक गांव ‘बनगांव’ की अपनी सांस्‍कृतिक पहचान है। यहां की ‘घुमौर होली’ इसी की एक कड़ी है। मान्‍यता है कि इसकी परंपरा भगवान श्रीकृष्‍ण के काल से ही चली आ रही है। वर्तमान में खेले जाने वाले होली का स्वरूप 18वीं सदी में यहां के प्रसिद्ध संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने तय किया था।

अद्भुत होता है होली का दृश्य : गांव के निवासी प्रो. रमेश चंद खां ने बताया कि इस होली का दृष्‍य अद्भुत होता है। युवाओं ने दो भागों में बंटकर खुले बदन गांव में घूमकर होली खेली। गांव के निर्धारित पांचों स्‍थलों (बंगलों) पर होली खेलने के बाद वे जैर (रैला) की शक्ल में भगवती स्थान पहुंचे। वहां वे गांव की सबसे ऊंची मानव श्रृंखला बनाई। इस दौरान संत लक्ष्मीपति रचित भजनों को गाते रहे।

पुरुषों की हुड़दंगी होली : भगवती स्‍थान के पास इमारतों पर रंग-बिरंगे पानी के फव्वारे लगाए गए थे। इनके नीचे लोग एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव श्रृंखला बनाई। इस बीच जगह-जगह गांव के घरों के झरोखों से महिलाएं भी रंग उड़ेलती रहीं।होली की असली हुड़दंग दोपहर बाद टाेलियों के माता भगवती के मंदिर पर जमा होने के बाद हुई। खासतौर से पुरुषों ने हुड़दंगी होली खेली। मानव श्रृंखला बनाकर होली खेलने तथा शक्ति प्रदर्शन के बाद बाबा जी कुटी में होली समाप्त हो गई।

मिटते दिखे सारे भेद : कहरा की प्रखंड प्रमुख अर्चना प्रकाश तथा ग्रामीण राधेश्‍याम झा ने बताया कि बनगांव की होली में हिन्दू-मुस्लिम का भेद नहीं रहता है। ऐसे में आज के दिन कोई छोटा और बड़ा नजर नहीं आ रहा। सहरसा के बीएन सिंह पप्‍पन के अनुसार बनगांव की होली को खेलने वालों के अलावा देखने वालों की संख्‍या भी हजारों में रही।

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