चुनावी साल में मास्टरस्ट्रोक लगा रहे CM, नीतीश को सियासत का चाणक्य यूं ही नहीं कहा जाता

बिहार में इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं लेकिन सूबे की राजनीति में चुनावी चौसर पर बाजियों का दौर अभी से शुरु हो चुका है. खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार अपने फैसलों से साबित कर रहे हैं कि उन्हें बिहार की राजनीति का चाणक्य क्यूं कहा जाता है. नीतीश कुमार को गठबंधन की सियासत की नब्ज पकड़ने में मास्टर कहा जाता है. इसका परिचय सीएम नीतीश ने हाल ही में तब दिया जब उन्होंने बिहार में नो एनआरसी प्रस्ताव पास कराया और एनपीआर पर भी सहयोगी बीजेपी को गच्चा दे दिया. नीतीश कुमार ने लगभग दो दशक से बीजेपी का पार्टनर रहते हुए अपनी छवि को सेकुलर बनाकर रखा है लेकिन पिछले एक साल में जिस तरह से तीन तलाक, सीएए और अनुच्छेद 370 पर अपने स्टैंड बदले उससे कहीं ना कहीं जनता में एक मैसेज चला गया कि नीतीश ने बीजेपी के सामने सरेंडर कर दिया है.लेकिन चुनावी साल में जिस तरीके से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सहयोगी बीजेपी के एजेंडों को किनारे लगाते हुए विपक्षी पार्टियों को भी साधा है उसे नीतीश का एक तीर से दो शिकार वाला मास्टरस्ट्रोक ही कहा जाएगा.

असल में नीतीश कुमार को पता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बीजेपी बैकफुट पर है दूसरी ओर बीते 16 जनवरी को अमित शाह ने अपने बिहार दौरे में क्लियर कर दिया कि राज्य में एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगा. NDA के घटक दलों बीजेपी व जेडीयू के अलावा लोक जनशक्ति पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान भी नीतीश के नेतृत्व में चुनाव में जाने की बात कह चुके हैं. साफ है कि बिहार में नीतीश कुमार एनडीए के निर्विवाद चेहरा हैं. गठबंधन के सहयोगी दलों में तालमेल बना रहे, इसके लिए सभी प्रमुख नेता प्रयास कर रहे हैं. इसी सिलसिले में शुक्रवार को सीएम नीतीश कुमार ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. दरअसल नीतीश कुमार बीजेपी अध्य्क्ष जे पी नड्डा के बेटे के शादी समारोह में भाग लेने दिल्ली पहुंचे थे.

नीतीश में है बैलेंसिंग फैक्टर
हाल ही में पवन वर्मा और प्रशांत किशोर को पार्टी से बाहर करने पर नीतीश कुमार के बारे में कहा जा रहा था कि उनकी सियासी राह अब बीजेपी के एजेंडे पर ही आगे बढ़ेगी. लेकिन NRC,NPR पर प्रस्ताव लाने और जातीय जनगणना की मांग उठाने के साथ-साथ एक बार फिर नीतीश कुमार बिहार के लिए विशेष राज्य की मांग के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने में जुटे हैं. असल में नीतीश कुमार के भीतर गजब का बैलेंसिंग फैक्टर है साथ ही गठबंधन की सियासत में भी वो माहिर हैं.नीतीश ने सालों से विचारधारा पर अलग स्टैण्ड रखने वाली बीजेपी को साध रखा है. नीतीश के बैलेंसिंग फैक्टर होने का प्रमाण तो पिछले चुनाव में भी मिला था. 2015 में नीतीश ने लालू जैसे धुरविरोधी को साध लिया. सबने देखा कि कैसे कभी बिहार की सियासत के किंगमेकर रहे लालू यादव ने नीतीश के नेतृत्व को कुबूला और महागठबंधन की सरकार बनाई.

नीतीश कुमार के बारे में सबसे खास बात ये है कि बिहार के दोनों ही सियासी खेमे में इस बात को लेकर हमेशा रस्साकशी भी चलती रहती है कि नीतीश कुमार उनके खेमे में आ जाएं. साफ है कि सूबे की सियासत में अगर किसी एक शख्स को साधने के लिए हर राजनीतिक दल कोशिश करता रहता है तो वह नीतीश कुमार हैं.नीतीश जिधर भी चले जाते हैं, उस गठबंधन का पलड़ा भारी हो जाता है. बिहार के संदर्भ में ये बात 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव में साबित भी हुई, जब जेडीयू- बीजेपी ने साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई.

तेजस्वी से मुलाकात पर अटकलें तेज
बीते दिनों तेजस्वी यादव और सीएम नीतीश कुमार की जब मुलाकात हुई तो एक बार फिर ये बात चल निकली कि आरजेडी और जेडीयू फिर साथ आने वाली हैं. हालांकि एक मार्च को जेडीयू कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान सीएम नीतीश कुमार ने ये साफ कर दिया है कि वे एनडीए के साथ ही रहेंगे. जाहिर है नीतीश कुमार ने साफ कर दिया है कि वो बीजेपी के साथ बने रहेंगे . लेकिन राजनीतिक जानकारों की माने तो सियासत में संभावनाए लगातार बदलती, पनपती रहती है. राजनीति है, कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है.

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